कुछ रोज पहले मै अपने पौञद्वय,अनुपम (7 साल) और राहुल (5 साल) , के साथ समुद्र के किनारे टाईलों से बने फूटपाथ पर टहल रहा था बच्चे अपने स्वभावनुसार इधर उधर दौड रहे थे उन्हे सम्हाल पाना मुझ पर भारी पड रहा था उनकी उफनती ऊर्जा को एक दिशा प्रदान करने के उद्देश्य से मैने उनहें एक खेल मे उलझाने की सोची........ मैने उनहे दूर लगे एक खम्बे की तरफ इशारा करते हुए कहा कि जो बच्चा यहाँ से उस खम्बे तक बिछी टाईल्सों की सही सही गिनती पहले बतायेगा उसे ईनाम दिया जायेगा........
पहले तो ईनाम क्या होगा, इसका खुलासा करने का मुझपर जोर डाला गया....... मेरे टालमटोल करने पर दोनो ने एक सुर मे इसे मेरी साजिश करार दे दिया और फिर ऐसे किसी भी कार्य मे भाग लेने से इनकार कर दिया जिसमें होनेवाले नफे नुकसान का उन्हे स्पष्ट ग्यान न हो ........... मैं अचम्भित
था, आजकी पौध की असामयिक परिपक्वता देखकर ......... खैर मैने हथियार डालते हुए एक चाकलेट देने का भरोषा दिया, मगर ....मगर बात यहीं खत्म नही हुई...... ऊनके पसन्दिदा ब्रांड और साइज की बात तय होने के बाद ही वह मैदान में उतरे...... दौड शुरू हुई.......... पहले अनुपम आया, उसने बताया १९७ टाइल्स लगी है ........... फिर राहुल,उसने वहाँ २०३ टाइल्स लगी होने का दावा किया ....... दोनों अपने अपने दावों पर अडिग थे, कोई भी ईनाम पर अपने दावे से पिछे हटने को तैयार न था .......बहस गरमाने लगी ...... बात हाथापाई की नौबत तक आ पहुंची ......... स्तिथी को नियन्ञण से बाहर जाते देख खुद टाईल्सों को गिनने का फैसला लिया .......... सही सँख्या थी २०१ ....... दोनों गलत थे ..... चाक़लेट पर हक किसी का नही था ...... दोनों उदास होकर इधर उधर झांकने लगे ......हठात् राहुल की आखें चमकने लगी ..... उसने सर उठाकर मेरी आखों में आखें डालते हुए कहा " मगर दस का दम के नियमों के तहत जीत मेरी हुई है और आप मुझे ईनाम देने से मना नही कर सकते " ........ मै आश्चर्य से मुँह फाडे उसकी तरफ देखता रहा ....... मुझे यह कहने मे अब कोई संकोच नही कि भारत ने बहुत तरक्की कर ली है.....
September 17, 2008
September 16, 2008
गणित
एक दिन,
सम्राट के ताज में जड़े एक़ ईठलाते मोती से ,
इक अदनी सी ओस की बूंद ने,
चिरौरि कर,
ओस से मोती बनने का राज जान लिया,
सीप,समुद्र, नक्षत्र का सहज गणित था,
मान लिया
नानी दादी से सुना था,
हर ओस में मोती बनने का ग़ुण विद्धमान है;
हर ओस क़ो मोती बनने का जन्मसिद्ध अधिकार है,
और.... यही संविधान है
फिर पुर्णिमा की एक रात,
स्वाति नक्षत्र के पावन काल में,
नियति की गणित से बेखबर,
भोली ओस ने
समुद्र मे बलखाती एक सीप को लक्ष्य मानकर,
अगले क्षण मोतीकरण निश्चित जानकर,
कल्पनाओं में झुमती,
सम्राट या सुन्दरी,
कभी यह कभी वह चुनती,
आखें बन्दकर
छलांग लगा ही दी:
मगर यह क्या ?
जब आँख खुली
वह कहीं ओर पडी थी,
सागर की मदमाती लहरों पर हर पल बिखरती हुई!
टुकडों में बंटते अपने वज़ुद को
लाचार आँखों से निहारती रही
और सीप
पास ही पड़ा हवा क़ा गणित समझा रहा था
penned by me on 21/09/1993
सम्राट के ताज में जड़े एक़ ईठलाते मोती से ,
इक अदनी सी ओस की बूंद ने,
चिरौरि कर,
ओस से मोती बनने का राज जान लिया,
सीप,समुद्र, नक्षत्र का सहज गणित था,
मान लिया
नानी दादी से सुना था,
हर ओस में मोती बनने का ग़ुण विद्धमान है;
हर ओस क़ो मोती बनने का जन्मसिद्ध अधिकार है,
और.... यही संविधान है
फिर पुर्णिमा की एक रात,
स्वाति नक्षत्र के पावन काल में,
नियति की गणित से बेखबर,
भोली ओस ने
समुद्र मे बलखाती एक सीप को लक्ष्य मानकर,
अगले क्षण मोतीकरण निश्चित जानकर,
कल्पनाओं में झुमती,
सम्राट या सुन्दरी,
कभी यह कभी वह चुनती,
आखें बन्दकर
छलांग लगा ही दी:
मगर यह क्या ?
जब आँख खुली
वह कहीं ओर पडी थी,
सागर की मदमाती लहरों पर हर पल बिखरती हुई!
टुकडों में बंटते अपने वज़ुद को
लाचार आँखों से निहारती रही
और सीप
पास ही पड़ा हवा क़ा गणित समझा रहा था
penned by me on 21/09/1993
September 15, 2008
आत्ममंथन.......
10 september 2008
मैं कौन हूँ?
मैं क्यो हूँ?
मेरे आने का कारण क्या है?
कितने बौद्धिक और अध्यात्मिक से लगते है ये सवाल!...... नही?
जब जब तथाकथित बुद्धीजीवी हम जैसे मूढ़ प्राणियो को संसार का सार समझाने में अपने आपको असमर्थ पाते हैं तब तब दाग दिए जाते हैं ऐसे ही वज़नदार अध्यात्मिक से लगनेवाले प्रश्न हम पर!
लेकिन क्यो?
क्या इन सवालो का कोई महत्व है?
क्या हम और हमारे ब्रह्माण्ड की सभी जड़ और चेतन बस्तुएं आदिकाल से निरंतर चलनेवाली सृजन और संहार क्रिया की उपज नही?
क्या हमारा जनम या मरन पे कोई अधिकार है? क्या हम जन्म या मृत्यु का समय, स्थान, रूप चुन सकते है?
नही ना?
फिर क्यों भटकते है इन फालतु से सवालो के साथ?
हम आज है -यह सत्य है, हम एकदिन नही होंगे- यह अटल सत्य है !
हमारा जन्म महज़ एक प्रक्रिया है. किसी विशेष योजना या उददेश्य के तहत किया ग़या सृजन नही!
ब्रह्माण्ड की उतपत्ति का रहस्य समझने में लग़े है हजारों साईंसदा अपने अपने तरीकों से
हम क्यो परेशान हों?
सुना है ,संसार की सारी बस्तु सुझ्मतम अणुओं के जोड़ से बनी है, हर बस्तु का निर्माण एक बिन्दु (उतक्) से शुरू होता है और यही उतक् बारम्बार स्वखंडित होकर उस बस्तु को उसका निर्धारित आकार देते है अगर परिस्तिथीयाँ अनुकूल हो तो यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक चरम अवस्था प्राप्त न कर ले, और फिर शुरू होती है उलटी गिनती, उतक़् क्रमवार निस्क्रिय हेकर प्राप्त होते है अपनी नियती को
हम कहाँ होते हैं इन सारी exercise के बीच ?
यह संसार रहस्यों से भरा है
कहते हैं हम ब्रह्माण्ड का चार प्रातिसत ही देख पाते हैं. शेष अंजाना है
ऐसा लगता है जैसे किसी ने कण कण में मिक्रोचिप्स लगा रखी हो - अनजाने नियमो के तहत सब कुछ अपने आप हो रहा है-सूर्य स्थिर है, बाकि ग्रह अपनी परिधि मैं अपने आप घूम रहे हैं , हवाएं अपनी गति और दिशा ख़ुद तय करती है , हम नही जानते बरसात किसी साल कम और किसी साल ज्यादा क्यों होती है! एक बिन्दु से एक जीव अपनी सारी विशेषताओं के साथ कैसे बिकसीत होता है? जब हम एक ही तरह के पदार्थ से बने हैं और एक ही प्रक्रिया से गुजरकर पुर्णता प्राप्त करते हैं तो इतने अलग-अलग क्यों होते हैं? इतनी बिसंगातियाँ क्यों होती है ?
क्या फिर भी " मैं कौन हूँ " जैसे प्रश्नों का कोई औचित्य रह जाता है.........???
मैं कौन हूँ?
मैं क्यो हूँ?
मेरे आने का कारण क्या है?
कितने बौद्धिक और अध्यात्मिक से लगते है ये सवाल!...... नही?
जब जब तथाकथित बुद्धीजीवी हम जैसे मूढ़ प्राणियो को संसार का सार समझाने में अपने आपको असमर्थ पाते हैं तब तब दाग दिए जाते हैं ऐसे ही वज़नदार अध्यात्मिक से लगनेवाले प्रश्न हम पर!
लेकिन क्यो?
क्या इन सवालो का कोई महत्व है?
क्या हम और हमारे ब्रह्माण्ड की सभी जड़ और चेतन बस्तुएं आदिकाल से निरंतर चलनेवाली सृजन और संहार क्रिया की उपज नही?
क्या हमारा जनम या मरन पे कोई अधिकार है? क्या हम जन्म या मृत्यु का समय, स्थान, रूप चुन सकते है?
नही ना?
फिर क्यों भटकते है इन फालतु से सवालो के साथ?
हम आज है -यह सत्य है, हम एकदिन नही होंगे- यह अटल सत्य है !
हमारा जन्म महज़ एक प्रक्रिया है. किसी विशेष योजना या उददेश्य के तहत किया ग़या सृजन नही!
ब्रह्माण्ड की उतपत्ति का रहस्य समझने में लग़े है हजारों साईंसदा अपने अपने तरीकों से
हम क्यो परेशान हों?
सुना है ,संसार की सारी बस्तु सुझ्मतम अणुओं के जोड़ से बनी है, हर बस्तु का निर्माण एक बिन्दु (उतक्) से शुरू होता है और यही उतक् बारम्बार स्वखंडित होकर उस बस्तु को उसका निर्धारित आकार देते है अगर परिस्तिथीयाँ अनुकूल हो तो यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक चरम अवस्था प्राप्त न कर ले, और फिर शुरू होती है उलटी गिनती, उतक़् क्रमवार निस्क्रिय हेकर प्राप्त होते है अपनी नियती को
हम कहाँ होते हैं इन सारी exercise के बीच ?
यह संसार रहस्यों से भरा है
कहते हैं हम ब्रह्माण्ड का चार प्रातिसत ही देख पाते हैं. शेष अंजाना है
ऐसा लगता है जैसे किसी ने कण कण में मिक्रोचिप्स लगा रखी हो - अनजाने नियमो के तहत सब कुछ अपने आप हो रहा है-सूर्य स्थिर है, बाकि ग्रह अपनी परिधि मैं अपने आप घूम रहे हैं , हवाएं अपनी गति और दिशा ख़ुद तय करती है , हम नही जानते बरसात किसी साल कम और किसी साल ज्यादा क्यों होती है! एक बिन्दु से एक जीव अपनी सारी विशेषताओं के साथ कैसे बिकसीत होता है? जब हम एक ही तरह के पदार्थ से बने हैं और एक ही प्रक्रिया से गुजरकर पुर्णता प्राप्त करते हैं तो इतने अलग-अलग क्यों होते हैं? इतनी बिसंगातियाँ क्यों होती है ?
क्या फिर भी " मैं कौन हूँ " जैसे प्रश्नों का कोई औचित्य रह जाता है.........???
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